इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यह नहीं कहा जा सकता कि पिता को अपने नाबालिग बच्चों की अभिरक्षा किसी भी व्यक्ति को सौंपने का अधिकार है और किसी को पिता की अभिरक्षा स्थानांतरित करने को चुनौती देने का अधिकार नहीं है। यह आदेश मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली एवं न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने युवराज, आयुष्मान व अन्य की विशेष अपील पर अधिवक्ता रामधन को सुनने के बाद अपील स्वीकार करते हुए दिया है।
एकल पीठ (सिंगल बेंच) ने कहा था कि एक पिता, जो नाबालिग बच्चे का नैसर्गिक संरक्षक है, उसे अपने नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा किसी भी व्यक्ति को स्थानांतरित करने का पूरा अधिकार है। खंडपीठ ने इसे नामंजूर करते हुए कहा किसी भी हालत में ऐसा आदेश कायम नहीं रह सकता। यह भी कि माता-पिता में से कोई एक पिता के इस अधिकार को चुनौती नहीं दे सकता कि वह अपनी मर्ज़ी और सहमति से नाबालिग की अभिरक्षा किसी दूसरे व्यक्ति को दे। यह भी पूरी तरह से टिकने लायक नहीं है।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका बहाल
खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश को रद्द करते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका फिर से बहाल कर दिया और कानून के अनुसार निर्णय लेने के लिए प्रकरण एकल पीठ को वापस कर दिया है। खंडपीठ ने कहा कि यह कहना पिता को नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा किसी भी व्यक्ति को ट्रांसफर करने का अधिकार है, कानून और नैतिकता के सभी नियमों के विपरीत है और इसलिए इसे खारिज किया जाना चाहिए।
चार मई को होगी अगली सुनवाई
गौरतलब है कि याचियों के पिता ने याची बच्चों की अभिरक्षा उनकी मां को देने की बजाय दूसरों को सौंप दिया। इसे अवैध निरूद्धि मानते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की गई। एकल पीठ ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि पिता को अपने नाबालिग बच्चों की अभिरक्षा किसी को भी सौंपने का अधिकार है। इस आदेश को विशेष अपील में चुनौती दी गई थी। खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश को रद्द कर दिया और कानून के अनुसार निर्णय लेने के लिए याचिका एकल पीठ को वापस कर दी। बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर अगली सुनवाई चार मई को होगी।
हाईकोर्ट ने खारिज की दो कर्मचारियों की याचिका
"इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि ऐसी नियुक्तियां जिनमें निर्धारित चयन प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है, अवैध मानी जाएगी। कोर्ट ने वाराणसी स्थित एक जूनियर हाईस्कूल के दो कर्मचारियों की याचिका खारिज करते हुए उनकी नियुक्ति को अवैध करार दिया है। लक्ष्मी शंकर तिवारी और एक अन्य की याचिका पर न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान ने यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ताओं ने शिक्षा निदेशक (बेसिक) के 20 दिसंबर 2014 के आदेश को चुनौती दी थी। साथ ही उन्होंने वेतन भुगतान और सेवा में हस्तक्षेप न करने की मांग की थी। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि वे 1980 से विद्यालय में क्रमशः चपरासी और लिपिक के पद पर कार्यरत हैं और उनकी नियुक्ति को बाद में गलत तरीके से बदला गया।"
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